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क्या यूपी के इस डॉन जैसा बनना चाहता है विकास दुबे, 90 के दशक में मचाया था आतंक

विकास दुबे की खौफनाक हकीकत कभी सामने नहीं आती, अगर कानपुर में 3 जुलाई की रात वो खूनी तांडव ना करता. जुर्म की दुनिया में विकास दुबे का इतिहास करीब 20 साल पुराना है, जिसे जानकर ऐसा लगता है कि विकास दुबे यूपी के सबसे बड़े डॉन श्रीप्रकाश शुक्ला की मौत के बाद उसकी जगह लेना चाहता था.
उत्तर प्रदेश पुलिस का मोस्ट वॉन्टेड अपराधी विकास दुबे लगातार पुलिस से भाग रहा है. अभी तक उसका कोई सुराग पुलिस के हाथ नहीं लग पाया है. कयास लगाए जा रहे हैं कि वो नेपाल भाग गया है. लेकिन पुलिस शिद्दत के साथ उसकी तलाश में जुटी है. उसे पकड़ने के लिए 40 टीमें गठित की गई हैं. पांच सौ से ज्यादा मोबाइल नंबर सर्विलांस पर लगाए गए हैं. विकास दुबे की खौफनाक हकीकत कभी सामने नहीं आती, अगर कानपुर में 3 जुलाई की रात वो खूनी तांडव ना करता. जुर्म की दुनिया में विकास दुबे का इतिहास करीब 20 साल पुराना है, जिसे जानकर ऐसा लगता है कि विकास दुबे यूपी के सबसे बड़े डॉन श्रीप्रकाश शुक्ला की मौत के बाद उसकी जगह लेना चाहता था.

बहुत से लोग सोच रहे होंगे कि ये श्रीप्रकाश शुक्ला का नाम कहां से आ गया. कौन था श्रीप्रकाश शुक्ला. तो हम आपको बताते हैं कि वो श्रीप्रकाश शुक्ला कौन था, जिसके नक्शे कदम पर चलकर विकास दुबे यूपी का सबसे बड़ा गैंगस्टर बनना चाहता था. जैसे विकास दुबे पर एक थाने में दर्जा प्राप्त मंत्री की सरेआम हत्या करने का इल्जाम था, वैसे ही श्रीप्रकाश शुक्ला ने बिहार सरकार के एक मंत्री को पटना जाकर दिनदहाड़े गोलियों से भून डाला था. श्रीप्रकाश शुक्ला उत्तर प्रदेश का वो माफिया डॉन था, जिसका एनकाउंटर देश में सबसे ज्यादा चर्चित हुआ था. 90 के दशक में शुक्ला ने यूपी सरकार को उस वक्त हिलाकर रख दिया था, जब उसने तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के नाम की सुपारी ले ली थी.
उत्तर प्रदेश पुलिस 90 के दशक का वो एनकाउंटर कभी नहीं भूल सकती. क्योंकि वो यूपी पुलिस के इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा एनकाउंटर था. कुख्यात गैंगस्टर श्रीप्रकाश शुक्ला का एनकाउंटर. यूपी में 90 के दशक में आतंक का सबसे बड़ा नाम था श्रीप्रकाश. उसके खात्मे के लिए यूपी पुलिस ने पहली बार स्पेशल टास्क फ़ोर्स का गठन किया था. 1998 में एसटीएफ ने श्रीप्रकाश शुक्ला को गाज़ियाबाद में मार गिराया था.

उसकी मौत के ठीक एक साल बाद ही विकास दुबे का नाम अपराध की दुनिया में पहचान बनाने लगा था. बता दें कि श्रीप्रकाश शुक्ला ने यूपी में ऐसा आतंक मचाया था कि उसकी करतूत जानकर आज भी लोगों का दिल दहल जाता है. जिन वारदातों को श्रीप्रकाश शुक्ला ने उस दौर में अंजाम दिया था, उन्हें जानकर आपके रोंगटे खड़े जाएंगे.

11 जनवरी 1997, अमीनाबाद, लखनऊ

लॉटरी का थोक व्यापारी पंकज श्रीवास्तव अपने ऑफिस में रोज की तरह काम कर रहा था. तभी उसके दफ्तर में तीन बदमाश अंदर दाखिल होते हैं और उसे गोली मार कर वहां से फरार हो जाते हैं.

12 मई 1997, लखनऊ

राजधानी लखनऊ में उस दौर के जाने-माने बिल्डर मूल चंद अरोड़ा का अपहरण कर लिया गया था. इस वारदात को बेखौफ अंजाम देने वाला और कोई नहीं बल्कि गैंगस्टर श्रीप्रकाश शुक्ला था. उसने बिल्डर को मुक्त करने की एवज में एक करोड़ की फिरौती वसूली थी और फिर उसे अपने तरीके से रिहा किया था.

अगस्त 1997, लखनऊ

दिलीप होटल के रूम नंबर 206 में चार लोग ठहरे थे. वो चारों उस वक्त कमरे में मौजूद थे. तभी होटल के नीचे एक कार आकर रुकती है. दो लोग कार से उतरकर सीधे कमरा नंबर 206 की तरफ बढ़ते हैं. उनके हाथों में एके-47 थी. सीढियां चढ़ने के बाद वो कमरे के बाहर पहुंचते हैं. एक शख्स दरवाजे पर लात मारता है और दरवाजा खुलते ही वो दोनों अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर देते हैं. कमरे में मौजूद चार में से 3 लोग बेड के नीचे छुप जाते हैं जबकि एक वहीं दम तोड़ देता है.

जाते वक्त गोली चलाने वाला शख्स बोलता है. जान बचानी है तो भाग जाओ. जो भी मेरे और टेंडर के बीच में आएगा, उसका यही अंजाम होगा. दरअसल, श्रीप्रकाश शुक्ला ने होटल में घुसकर गोरखपुर के 4 ठेकेदारों को गोली मारी थी. उनमें से एक की मौत हो गई थी. जबकि तीन घायल हुए थे. ये सब टेंडर कब्जाने के लिए किया गया था.

अक्टूबर 1997, लखनऊ

गोखले मार्ग पर रहने वाले दवा व्यापारी के.के. रस्तोगी पार्क में जाने के लिए कार में बैठते हैं. उनका बेटा कार ड्राइव कर रहा था. तभी पीछे से एक कार उनकी कार में टक्कर मारती है. रस्तोगी का बेटा कुनाल गुस्से में कार से उतरता है और टक्कर मारने वाले को खरी-खोटी सुनाने लगता है.

तभी कार से उतरकर बदमाश कुनाल को अपनी कार में बैठा लेते हैं. के.के. रस्तोगी बदमाशों की कार का पीछा करते हैं. रस्तोगी बदमाशों की कार में टक्कर मारते हैं और बदमाश कार रोक देते हैं. श्रीप्रकाश कार से उतरता है और पिस्तौल निकालकर केके रस्तोगी को गोली मार देता है. उनके बेटे को अगवा करके ले जाता है. फिर कुनाल को छोड़ने की एवज में उसके परिवार से एक करोड़ की फिरौती मांगी जाती है.

18 जनवरी 1998, लखनऊ

यूपी को-ऑपरेटिव के चेयरमैन उपेंद्र विक्रम सिंह अपने दफ्तर से निकलकर कार की तरफ बढ़े ही थे कि उनके सामने एक कार आकर रुकती है. कार से एके-47 से लैस बदमाश उतरते हैं और उपेंद्र पर हमला बोल देते हैं. सैकड़ों राउंड फायरिंग होती है. इस हमले में उपेंद्र मारे जाते हैं. बदमाश अपनी कार छोड़ कर भाग जाते हैं. इस वारदात के दौरान श्रीप्रकाश शुक्ला एक साथ 4 लोगों का मर्डर करता है. वजह थी रेलवे का ठेका. ऐसे ही ना जाने उसने कितने लोगों का खून बहाया. कितनी वारदातों को अंजाम दिया.

शाही की हत्या से उछला नाम

बाहुबली बनकर श्रीप्रकाश शुक्ला अब जुर्म की दुनिया में नाम कमा रहा था. इसी दौरान उसने 1997 में राजनेता और कुख्यात अपराधी वीरेन्द्र शाही की लखनऊ में हत्या कर दी थी. माना जाता है कि शाही के विरोधी हरि शंकर तिवारी के इशारे पर यह सब हुआ था. वह चिल्लुपार विधानसभा सीट से चुनाव लड़ना चाहता था. इसके बाद एक एक करके न जाने कितनी ही हत्या, अपहरण, अवैध वसूली और धमकी के मामले श्रीप्रकाश शुक्ला के नाम लिखे गए थे.

रेलवे के ठेकों पर था एक-छत्र राज

श्रीप्रकाश शुक्ला पुलिस की पहुंच से बाहर था. उसका नाम उससे भी बड़ा बनता जा रहा था. यूपी पुलिस हैरान-परेशान थी. नाम पता था लेकिन उसकी कोई तस्‍वीर पुलिस के पास नहीं थी. कारोबारियों से उगाही, किडनैपिंग, कत्ल, डकैती, पूरब से लेकर पश्चिम तक रेलवे के ठेके पर एकछत्र राज. बस यही उसका पेशा था. और इसके बीच जो भी आया उसने उसे मारने में जरा भी देरी नहीं की. लिहाजा लोग तो लोग पुलिस तक उससे डरती थी.

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